‘वो’ आ रहा है
‘गेमचेंजर’ राफेल का स्वागत नहीं करेंगे आप!
इक्कीसवीं शताब्दी की दुनिया में जंग वही देश जीतेगा जिसकी वायुसेना में ताकत
होगी और आधुनिक लड़ाकू जहाज होंगे। ये कोई रॉकेट साइंस का गूढ़ रहस्य नहीं
है, तमाम डिफेंस एक्सपर्ट ये बात कहते रहे हैं। पाकिस्तान से दशकों पुरानी दुश्मनी
और चीन से हालिया तनातनी के बीच इंडियन एयरफोर्स और उसके तरकश में आने वाले ‘ब्रह्मास्त्र’ राफेल की चर्चा आजकल जोरों पर है।
राफेल का इंतजार तो भारत साल 2012 से कर रहा है जब मनमोहन सिंह की सरकार ने
126 लड़ाकू विमानों का ऑर्डर दिया था। बाद में 126 विमानों का ऑर्डर रद्द करके
नरेंद्र मोदी की सरकार ने साल 2016 में पूरी तरह से तैयार 36 ऑपरेशन रेडी विमानों
का सौदा किया। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने पिछले साल 8 अक्टूबर को फ्रांस में
राफेल की डिलीवरी ली थी। इस महीने के आखिर में दुनिया के सबसे आधुनिक और घातक
लड़ाकू विमानों में शुमार राफेल भारत के आसमान में उड़ान भरेगा और उसकी गर्जना दुश्मनों
के दिलों में खौफ भर देगी।
राफेल में ऐसा क्या है जो उसे चीन और पाकिस्तान की एयरफोर्स के लड़ाकू विमानों
से अलग बनाता है। राफेल की रफ्तार 2000 किलोमीटर प्रति घंटे से ज्यादा है और इसकी
रेंज करीब 3700 किलोमीटर है। हिमालय की ऊंची चोटियां हों या राजस्थान का रेगिस्तान,
राफेल हर मौसम और हर परिस्थिति में बेहद ही घातक है। भारत को मिलने वाला राफेल बियॉन्ड
रेंज विजुअल मिसाइल से लैस है। राफेल में लगा रडार इलेक्ट्रॉनिक स्कैनिंग से
थ्रीडी मैपिंग करके रियल टाइम में दुश्मन की पोजिशन पता कर लेता है। सीधे शब्दों में
समझना हो तो इस विमान में लगी मिसाइल दुश्मन के प्लेन को बिना देखे सीधे फायर करके
उसे जमीन पर गिरा सकती है। जो राफेल विमान भारत आ रहा है उसमें दुनिया की सबसे आधुनिक
हवा से हवा में मार करने वाली मीटियॉर मिसाइल लगी होगी। ये मिसाइल फिलहाल एशिया के
किसी भी देश की वायुसेना के पास नहीं है। ना चीन और ना ही पाकिस्तान। भारत को
मिलने वाला राफेल 4.5 जेनरेशन वाला मल्टी रोल फाइटर प्लेन है। इसकी एक और ताकत जो
इसे दूसरे जंगी जहाजों से खास बनाती है वो है इसमें लगी स्काल्प मिसाइल। करीब 550
किलोमीटर रेंज वाली ये मिसाइल किसी भी बंकर को आसानी से तबाह कर सकती है। इसका
मतलब ये हुआ कि राफेल को दुश्मन के बंकर बर्बाद करने के लिए उसकी सीमा में घुसना
नहीं पड़ेगा। याद कीजिए जब भारत ने बालाकोट में आतंकी अड्डों को उड़ाया था तो
मिराज 2000 प्लेन को पाकिस्तान के वायुक्षेत्र में जाना पड़ा था। फ्रांस स्काल्प
मिसाइल का इस्तेमाल लाबिया और सीरिया में कामयाबी के साथ कर चुका है।
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| Flying Rafale Jet |
भारतीय वायुसेना को पिछली बार साल 1996 में रूस से खरीदे गए सुखोई के तौर पर
लड़ाकू विमानों की खेप मिली थी। 24 साल में भारत की जरूरतें बढ़ी हैं, सामरिक
दृष्टि से भारत की सुरक्षा चिंताएं भी बदली हैं। हिंद महासागर क्षेत्र में भारत का
रोल बढ़ा है और इन सब जिम्मेदारियों को निभाने में भारतीय वायुसेना को थोड़ी
दिक्कत आ रही थी। वायुसेना की ताकत महज 31 स्क्वॉड्रन तक सिमट गई है। चीन और पाकिस्तान
के डबल फ्रंट का मुकाबला करने और नई वैश्विक व्यवस्था में अपना रोल निभाने के लिए
अगले कुछ साल में भारत को 42 स्क्वॉड्रन की जरूरत पड़ेगी। परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम राफेल के आने से
वायुसेना को फिलहाल के लिए धार मिलेगी।
महीने के आखिर में आने वाला राफेल वायुसेना की गौरवशाली गोल्डन ऐरो 17 स्क्वॉड्रन
का हिस्सा होगा। राफेल विमानों को हरियाणा के अंबाला और पश्चिम बंगाल के हाशीमारा
एयरबेस पर तैनात किया जाएगा। अंबाला और हाशीमारा एयरबेस पर राफेल की मौजूदगी
उत्तरी और पूर्वी वायुक्षेत्र को अभेद्य किले में तब्दील कर देगी। यही वजह है कि
राफेल को भारत का ट्रंप कार्ड कहा जा रहा है।



